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2023 में राजस्थान में होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले भाजपा जातीय समीकरणों को साधने में जुट गई है। पिछले महीने पार्टी ने राज्य इकाई का नेतृत्व करने के लिए एक ब्राह्मण चेहरे को चुना था। चितौड़गढ़ से सांसद चंद्र प्रकाश जोशी (सी पी जोशी) को भाजपा की राजस्थान इकाई की जिम्मेदारी सौंपी गई। उन्होंने प्रदेश अध्यक्ष के रूप में सतीश पूनिया की जगह ली। वहीं, आज राजस्थान विधानसभा में उप नेता प्रतिपक्ष राजेंद्र राठौड़ को विपक्ष का नेता बनाया गया। इस तरह आलाकमान की ओर से राज्य में राजनीतिक रूप से मजबूत राजपूत समुदाय को पार्टी से जोड़ने का प्रयास किया गया। 

इस साल फरवरी में गुलाब चंद कटारिया को असम के राज्यपाल के रूप में नियुक्त किए जाने के बाद से विपक्ष के नेता का पद खाली था। नई नियुक्तियों के बारे में निर्णय की घोषणा पार्टी प्रदेश मुख्यालय में भाजपा विधायकों की बैठक के बाद की गई। बैठक में पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे भी मौजूद रहीं। भाजपा के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष सतीश पूनिया को विपक्ष का नया उपनेता बनाया गया। पूनिया आमेर विधानसभा क्षेत्र से विधायक हैं। वह लगभग 3 साल से पार्टी की राज्य इकाई का नेतृत्व कर रहे थे। 

कटारिया की कमी को पूरा करने की कोशिश

ब्राह्मण समाज से ताल्लुक रखने वाले सी पी जोशी ने 2019 के लोकसभा चुनाव में भारी मतों से जीत दर्ज की और दूसरी बार संसद पहुंचे। जोशी कभी राजस्थान की पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के बेहद करीबी माने जाते थे। हालांकि, उनके बारे में पार्टी के एक वर्ग का मानना है कि वह राजस्थान में भाजपा के किसी गुट के नहीं हैं। पूनिया के वसुंधरा से कभी अच्छे संबंध नहीं रहे। प्रदेश भाजपा के एक नेता ने कहा कि उदयपुर संभाग में कटारिया की कमी को पूरा करने के लिए भाजपा को एक मजबूत नेता की जरूरत थी, ताकि आगामी चुनावों में पार्टी को इन क्षेत्रों में कोई नुकसान ना हो।

जातिगत समीकरणों की ओर साफ इशारा 

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि सतीश पूनिया, सीपी जोशी और राजेंद्र राठौड़ की नियुक्तियां जातिगत समीकरणों की ओर साफ तौर से इशारा करती हैं। यह एक ऐसी स्थिति है जिससे तीनों समुदायों (जाट, ब्राह्मण और राजपूत) को खुश करने का प्रयास नजर आता है। 2018 में भाजपा ने वसुंधरा राजे के नेतृत्व में चुनाव लड़ा था। ऐसा माना जाता है कि राजस्थान में सभी 36 समुदायों पर राजे का बराबर का असर रहता है। दरअसल, वह ग्वालियर की क्षत्रिय हैं। जाट धौलपुर शाही परिवार में उनकी शादी हुई। राजे की बहू गुर्जर समुदाय से ताल्लुक रखती हैं। इस हालात को देखते हुए बीजेपी को अन्य जातियों को साधने में ज्यादा मेहनत नहीं करनी पड़ी। मगर, चुनावी नतीजे उम्मीदों के उलट रहे। बीजेपी को हार झेलनी पड़ी।

2018 वाली गलती से बचने का प्रयास

2018 में विधानसभा चुनाव से ठीक पहले भाजपा आलाकमान ने राजपूतों को रिझाने के लिए गजेंद्र सिंह शेखावत को स्टेट यूनिट चीफ का पद देने का प्रयास किया। दरअसल, वह आनंद पाल मुठभेड़ मामले को लेकर वसुंधरा राजे से नाराज चल रहे थे। कहा जाता है कि राजे ने इस प्रयास को रोक दिया और अशोक परनामी भाजपा प्रमुख बनाए गए। मगर, विधानसभा चुनाव में पार्टी की हार के बाद उन्हें अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा। इस बार बीजेपी के पास राजस्थान भर में अपील करने वाले नेताओं की कमी नजर आ रही है। ऐसे में पार्टी के लिए जातिगत गणित जरूरी हो गया है। साथ ही पार्टी की योजना वसुंधरा राजे के करिश्मे का इस्तेमाल करने और उन्हें नाराज नहीं करने की है।

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